बुधवार, 31 अगस्त 2011

प्रशन- पत्र

प्रशन पत्र
ऐ मेरे खुदा
तुम ने जो
ज़िन्दगी का प्रशन पत्र
सुलझाने के लिए दिया था
मुझे समझ नहीं आया
मुझे पता नहीं चल सका
ये आस पास
चलते फिरते
ठहरते दौड़ते
कौन लोग थे ?
मुझे पता नहीं चला
ज़िन्दगी क्या ?
मौत क्या ?
तृष्णा क्या ?
त्रिप्ती क्या ?
मैं कौन ?
तूँ कौन ?

मुझे बिलकुल
समझ नही आया
रिश्तों का ताना -बाना
बनते टूटते
सम्बधों के संबध
डूबते तैरते
अहसास की तरंगे
रोते चीखते
जज़्बात की उमंगें
मुहब्बत ?
नफरत ?
मुझे समझ नहीं आई
ये भाग-दौड़
कहाँ पहुचना ....?
कहाँ जाना ...?
आखिर
क्या पाना ?

पता ही ना चला
जीवन ...
कब गुज़र गया
अखबार पड़ते पड़ते
कुछ सूचनाएँ थी
कत्लों की
कातिलों की
कुछ उजड़ गये
कुछ उजाड़ गये
बहुत तबाही हुई
बहुत तबाही देखी
बांसुरी बजती रही
शहनाईआं गूंजती रही .....

मुझे समझ नहीं आयी
इस उतर -पत्रिका में
क्या लिखूं ?
जो सोचा
भूल गया
जो लिखा
मिटता गया
शब्द मिलें
तो अर्थ गुम
सब गुमसुम ......

पर मैंने तो
अपने ही ढंग से सोचा
अपने ही ढंग से
इसे समझा
बिना किसी खुआहिश के
बिना किसी प्राप्ति के
तृष्णा और तृप्ति के
इस युद्ध की
जैसे मुझे
खबर ही नहीं ....

मैं तेरी इस
कक्षा का
सब से पीछे
बैठा विदार्थी
जो सारा वकत
एक अफरा-तफरी
देखता रहा
और सोचता रहा
प्रशनों को
बिना किसी उतर के
और चल पड़ा
तुमे अपनी
उतर -पत्रिका देने .....

इस लिए
ऐ मेरे खुदा
तुम अपने
इस विदार्थी को
शून्य बटा सौ
दे सकते हो .....

मेरी उतर -पत्रिका
देख कर
क्या सोच रहे हो ?
क्यों सोच रहे हो ?
मैं जनता हूँ ...
तुम सोच रहे हो
इसका क्या करू ?
किस रूप में ढालूँ इसे .....

कहीं भी भेज दो
ऐ मेरे खुदा
पर मेरी
एक गुजारिश है
मुझे इंसान मत बनाना
इंसान होने की पीड़ा
मैं जान गया हूँ
पहचान गया हूँ .....

तुम
मुझे
कोई भी आकार दे दो
यहाँ तुम मुझे
पहचान सको
मैं तुमे
जान सकूं ....

मैं नहीं
सुलझा सका
ज़िन्दगी का
प्रशन- पत्र
जो तुम ने म

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